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SWAMI VIVEKANAND SAID:



"TALK TO YOURSELF ATLEAST ONCE IN A DAY
OTHERWISE
YOU MAY MISS A MEETING WITH AN EXCELLENT PERSON IN THIS WORLD".........

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रविवार, 23 जनवरी 2011

यारा लगा मन..........


यारा लगा मन फकीरी में 
न डर खोने का 
न खुशी कुछ पाने का 
ये जहां है अपना 
बीते न दिन गरीबी में 

यारा लगा मन फकीरी में 

जब से लागी लगन उस रब से 
मन बैरागी सा हो गया 
पथ-पथ घूमूं ढूंडू पिया को 
ये फकीरा काफ़िर बन गया 

मन फकीरा ये जान न पाए 
आखिर उसे जाना है कहाँ 
रब दे वास्ते ढूंडन लागी 
रास्ता-रास्ता गलियाँ-गलियाँ 

क्या करूँ कुछ समझ न आये 
उस रब दे मिलने के वास्ते 
ढूँढ लिया सब ठौर-ठिकाने 
गली,कूचे और रास्ते 

जाने कब जुड़ेगा नाता 
और ये फकीर तर जावेगा 
सूख गयी आँखे ये देखन वास्ते 
रब ये मिलन कब करवावेगा

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

देश दशा

रक्त-रंजित ये देश कैसे ये तरुण - अरुण भयभीत कैसे
नारी अस्मिता संकट में कैसे इन प्रश्नों के उत्तर कहाँ

राज नेतायों के प्रपंच कैसे बढे अपराधिओं के हिम्मत है कैसे
ये संस्कारों का ह्रास कैसे इन प्रश्नों के उत्तर कहाँ

ये सृजन शक्ति का अपमान कैसा ये सभ्यता का परिहास कैसा
दायित्व  ये हमारा ही है चेतना जगाएं हम यहाँ

इन सवालों का जवाब देश के जो है नवाब
यदि उनमे जागृत हो सतर्कता तो डर नहीं है क्यों ज़नाब ? 

हम आत्म मंथन तो करें देखे तो अपना योगदान
अपने को जागृत करके ही गढे हम नया हिन्दोस्ताँ

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

इस पार प्रिये तुम हो

मुझे उस पार…. नहीं जाना ………..क्योंकि इस पार …
मैं तुम्हारी संगिनी हूँ ……..उस पार निस्संग जीवन है
स्वागत के लिए ……………इस पार मैं सहधर्मिणी
कहलाती हूँ ……..मातृत्व सुख से परिपूर्ण हूँ………………..
माता – पिता है …..देवता स्वरुप …….पूजने के लिए
उस पार मै स्वाधीन हूँ ………पर स्वाधीनता का
रसास्वादन एकाकी है……….. गरल सामान……..
इस पार रिश्तों की  पराधीनता  मुझे ……………….
सहर्ष स्वीकार है…………इस पार प्रिये तुम हो

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

विचारों का बादल...........


विचारों का बादल उमड़ते घुमड़ते आ ही जाते है
शब्द जाल के उधेड़ बुन में जकड़ ही जाते है
व्याकरण की चाशनी में डूब ही जाती है
वर्ण-छंद के लय ताल में पिरो दी जाती है

लेखनी की झुरमुटों से जब निकलता  है
विचार मात्र विचार ही नहीं वांग्मय बन जाता है
कृति ये ज्योत बनकर जगमगाता है
अपने प्रकाश से प्रकाशित कर सब पर छा जाता है

तिस पर उसे गर स्वर में बांधा तो गीत बनता है
सुर का जादू गर चले तो समां बंध जाता है
विचारों को बढ़ने के दो पग मिल जाते है
(इस तरह )सम्पूर्णता को प्राप्त कर वो झिलमिलाते है

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

सुन्दर ये मुखड़ा



सुन्दर ये मुखड़ा
चाँद का टुकडा
नयन विशाल है
अधर कोमल
————–
कटिबंध अनुपम
वलय निरूपम
कही है हीरक
कही कंचन
————-
नुपुर से सज्जित-
पग है, राजित -
घुंगर की ध्वनि
मृदु मद्धिम
————-
स्वर्णिम ये काया
मन में समाया
नायिका सी
सुन्दर है चलन

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010


चढ़कर इश्क की कई मंजिले
अब ये समझ आया
इश्क के दामन में फूल भी है
और कांटे भी
और मेरे हाथ काँटों भरा
फूल आया
-------------
फूल सा इश्क पाकर
फूला न समाया
पर बेवफाई का काँटा हर फूल ने
ज़रूर चुभाया
----------------
अब तो मेरी हालत देख
दोस्त ये कहे
इश्क का तो यही ताकाज़ा है
तेरा दिल हर फूल पे
क्यों आया

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

मानवता के काम आओ
मनुष्यता तो है तभी
बनो परोपकारी तुम
मानव कहलाओगे तभी

दानकर्म से बड़ा
नही है पुण्य सच है ये
कर्ण है उदाहरण
दिया कवच है दान में

कर्म जो है पर हितार्थ
संकोच ना करो ज़रा
दधीची के ही त्याग से
बना है इंद्रवज्रा

नीलकंठ ने पीया था विष
धरा बचाने को
बुद्ध ने दिया था ज्ञान
हिंसा को तुम त्याग दो

मृत्यु तो है पूर्ण सत्य
पर काम ऐसे ही करो
याद जो करे सभी
मरो तो ऐसे ही मरो 

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

आज हिंदी दिवस है . सभी हिंदी चिट्ठाकारों को मेरी ओर से हार्दिक बधाइयां

आज हिंदी दिवस है . सभी हिंदी चिट्ठाकारों को मेरी ओर से हार्दिक बधाइयां .इस अवसर पर प्रस्तुत है एक कविता
निजु भाषा उन्नति अह़े सब उन्नति के मूल
बिनु निजु भाषा ज्ञान के मिटे न हिय के शूल
                       --- "भारतेंदु हरिश्चंद "----

अब प्रस्तुत है मेरी लिखी एक कविता :

तेरी अधरों की मुस्कान
देखने को हम तरस गए
घटाए भी उमड़-घुमड़ कर
यहाँ वहाँ बरस गए

पर तेरी वो मुस्कान
जो होंठों पर कभी कायम था
पता नहीं क्यों किस जहां में
जाकर सिमट गए

तेरी दिल की पुकार
सुनना ही मेरी चाहत है
प्यार की कशिश को पहचानो
ये दिल तुझसे आहत है

मुस्कुराना गुनाह तो नहीं
ज़रिया है जाहिर करने का
होंठो से न सही इन आँखों से
बता दो जो दिल की छटपटाहट है

सोमवार, 13 सितंबर 2010

जाह्नवी हूँ

   मै नदी हूँ .............
पहाड़ो से निकली 
नदों से मिलती 
कठिन धरातल पर              
उफनती उछलती 
प्रवाह तरंगिनी हूँ 
                                    

परवाह किसे है 
ले चलती किसे मै 
रेट हो या  मिटटी   
न छोडूँ उसे मै 
तरल प्रवाहिनी हूँ 
                               
राह बनाती 
सागर जा मिलती 
 पर्वत से अमृत को 
लेकर मै चलती 
न आदि न अंत 
शिव जटा से प्रवाहित           
जाह्नवी हूँ 
                                        

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

मेरी चाहत

Water Illusion Wallpaper


पेड़ के पीछे से
झरनों के नीचे से
नदियों के किनारे से
बागियों के दामन से
पहाड़ों की ऊँचाई से
नाम तेरा पुकारूं

पेड़ो से टकराकर
झरनों से लिपटकर
नदियों से बलखाकर
बागियों को महकाकर
पहाडो की वादियों से
नाम तेरा गूंजे
तुझे कई बार सुनाई दे

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

पुकार

 अब के बरस फिर न जाओ सजनवा बिदेस
सावन जो आयो मै हो जाऊँगी रे उदास
ये बरखा के रिमझिम ये साँसे ये धड़कन कहे
न जाओ सजन छोड़ो अब न करो धन की आस

उन पैसों का क्या काम जो ले जावे है मुझसे दूर
मेरे मन का आँगन पड़ी रह जावेगी सून
न जइयो न जइयो पुकारूँ तुझे बार बार
रुक जइयो सुनकर ये कारुणिक मेरी है पुकार

बुधवार, 8 सितंबर 2010

अनुमति दो माँ ..........

चरण-स्पर्श का अनुमति दो माँ 
चरणों से दूर मुझे मत करो 

           ये अधिकार मुझे जन्म से ही मिला है 
इस अधिकार को मत हरो 

ऐसा क्या अनर्थ हुआ है मुझसे 
कि आपने मूंह फेर लिया 

नौ महीने मुझे गर्भा में स्थान दिया 
पर दुनिया में लाकर त्याग दिया 

माना कि गलती थी मेरी 
आपका सुध मैंने नही लिया 

पर माँ कि ममता नही होता क्षण-भंगुर 
कभी त्याग दिया कभी समेट लिया 

माना मै हूँ स्वार्थ का मारा 
माँ की ममता न पहचान पाया 

पर आप ने भी तो अधिकार न जताया 
मुझे पराया घोषित कर दिया 

अब मेरी बस इतनी इच्छा है 
आप की गोद में मैं वापस आऊँ 

अपने संतान से जब आहत हुआ ये मन 
लगा माँ की गोद में ही सिमट जाऊं 

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

रात का सूनापन

3D Snowy Cottage animated wallpaper

रात का सूनापन

मेरी जिन्दगी को सताए

दिन का उजाला भी

मेरे मन को भरमाये

क्यों इस जिन्दगी में

सूनापन पसर गया

खिलखिलाती ये जिन्दगी

गम में बदल गया

आना मेरी जिन्दगी में तेरा

एक नया सुबह था

वो रात भी नयी थी

वो वक्त खुशगवार था

वो हाथ पकड़ कर चलना

खिली चांदनी रात में

सुबह का रहता था इंतज़ार

मिलने की आस में

पर जाने वो हसीं पल

मुझसे क्यों छिन गया

जो थे इतने पास-पास

वो अजनबी सा बन गया

मेरे अनुरागी मन को

बैरागी बना दिया

रोग प्रेम का है ही ऐसा

कभी दिल बहल गया

कभी दिल दहल गया

बुधवार, 1 सितंबर 2010

मै और मेरी तन्हाई




इस सूने कमरे में है बस
मै और मेरी तन्हाई
दीवारों का रंग पड गया फीका
थक गयी आँखे पर वो न आयी
छवि जो उसकी दिल में समाया
दीवारों पर टांग दिया
तू नही पर तेरी छवि से ही
टूटे मन को बहला लिया
पर क्या करूँ इस अकेलेपन का
बूँद-बूँद मन को रिसता है
उस मन को भी न तज पाऊँ मै
जिस मन में वो छब बसता है
शायद वो आ जाए एक दिन
एकाकी घर संवर जाए
इस निस्संग एकाकीपन को
साथ कभी तेरा मिल जाए

सोमवार, 30 अगस्त 2010

'ध्रुवतारा'




तारा टूटा है दिल तो नही 
चहरे पर छाई ये उदासी क्यों 
इनकी तो है बरात अपनी 
तुम पर छाई ये विरानी क्यों 


न चमक अपनी इन तारों की 
न रोशनी की  राह दिखा सके 
दूर टिमटिमाती इन तारों से 
तुम अपना मन बहलाती क्यों 


कहते है ये टूटते तारे 
मुराद पूरी करता जाय 
पर नामुराद मन को तेरी 
टूटते हुए छलता  जाए क्यों 


मत देखो इन नक्षत्रों को 
इसने सबको है भरमाया 
गर देखना ही है देखो उसे 
जो अटल अडिग वो है 'ध्रुवतारा'




शनिवार, 21 अगस्त 2010

नज़्म

           (1)
चाँद खिला पर रौशनी नही आयी
रात बीती पर दिन न चढ़ा
अर्श  से फर्श तक  के सफ़र में
कमबख्त रौशनी तबाह हो गया
             (2)
दिल की हालत कुछ यूं बयान हुई
कुछ इधर गिरा कुछ उधर गिरा
राह-ए-उल्फत का ये नजराना है जालिम
न वो तुझे मिला न वो मुझे मिला







hamne dekhi hai.mp...

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

गुरुदेव द्वारा रचित कविता से अनुदित

कई बार सोचा मैंने अपने आपको भूलकर 
तुम्हारे चरणों पर समर्पित करून अपने हृदय को खोलकर 

मन ही मन सोचता हूँ दूर तुमसे मैं रहूँ 
जीवन भर एकाकी रहकर मैं अदृश्य हो जाऊं 

कोई समझे न ये मेरी गहरी प्रणय कथा 
कोई जाने न ये मेरी अश्रु पूर्ण हृदय -व्यथा 

आज कैसे मैं ये बातें सबके समक्ष कहूं 
प्रेम कितना तुमसे है ये कैसे उजागर करूँ 


कई बार सोचा मैंने अपने आपको भूलकर 
तुम्हारे चरणों पर समर्पित करूँ अपने हृदय को खोलकर 

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

पूरक

सुरज ने कहा यदि हम न उगें तो रत्रि कि कौन भगाए 
चन्दा ये कहे यदि मै न आऊँ कवि मन को कौन उकसाये
धरती ये कहे यदि न चलूँ तो क्या सूरज क्या चन्दा
दोनों ही है व्यर्थ बस मैं हूँ समर्थ भार लेती हूँ जन जन का
पशू – पक्षी कहे छोडो उनको उनका तो है लड़ना काम
कभी चन्द्र ग्रहण कभी सूर्य ग्रहण भूकम्प करे काम तमाम
यदि हुम न रहे सूरज न उगे चन्दा की तो क्या है बिसात
धरती की सारी सुन्दरता पर छायी है अपनी जमात
मानव ये कहे क्यों ये झगड़े कभी सुन लो हमारी भी बात
अस्तित्व तुम्हारी तभी तक है जब हुम सुने ये फ़रियाद
पेड़-पौधे कहे मुझे नष्ट न करो मानव हम पेड़ उगाये
धरती ये कहे मुझे मत बाँटो मानव फ़िर दोस्ती बढ़ाये
पशू –पक्षी कहे हमें मत मारो मानव हम उनको बचाये
हम ही तो है सबके रक्षक क्या हो यदी भक्षक बन जाये
सच तो है धरा सूरज चन्दा पशू पक्षी और हम इन्सां
सब एक दूजे के पूरक है उनमे न हो कोइ हिंसा

बुधवार, 18 अगस्त 2010

अमृतान्जल

आसमान का रंग है नीला हरी-हरी सी धरती
मटमैला है रंग ज़मीं की पर रंग नहीं है जल की

हर रंग में  यह ढल जाती है है यह बात गजब की
नष्ट न करो इस अमृत को संरक्षण कर लो जल की

पीकर घूँट अमृत की  जन-जन धन्यवाद दो इश्वर को
बेकार न हो जाये जीवन पानी को सांस समझ लो

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