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SWAMI VIVEKANAND SAID:
"TALK TO YOURSELF ATLEAST ONCE IN A DAY
OTHERWISE
YOU MAY MISS A MEETING WITH AN EXCELLENT PERSON IN THIS WORLD".........
सोमवार, 21 मार्च 2011
बुधवार, 16 मार्च 2011
रविवार, 23 जनवरी 2011
यारा लगा मन..........
यारा लगा मन फकीरी में
न डर खोने का
न खुशी कुछ पाने का
ये जहां है अपना
बीते न दिन गरीबी में
यारा लगा मन फकीरी में
जब से लागी लगन उस रब से
मन बैरागी सा हो गया
पथ-पथ घूमूं ढूंडू पिया को
ये फकीरा काफ़िर बन गया
मन फकीरा ये जान न पाए
आखिर उसे जाना है कहाँ
रब दे वास्ते ढूंडन लागी
रास्ता-रास्ता गलियाँ-गलियाँ
क्या करूँ कुछ समझ न आये
उस रब दे मिलने के वास्ते
ढूँढ लिया सब ठौर-ठिकाने
गली,कूचे और रास्ते
जाने कब जुड़ेगा नाता
और ये फकीर तर जावेगा
सूख गयी आँखे ये देखन वास्ते
रब ये मिलन कब करवावेगा
बुधवार, 27 अक्टूबर 2010
देश दशा
रक्त-रंजित ये देश कैसे ये तरुण - अरुण भयभीत कैसे
नारी अस्मिता संकट में कैसे इन प्रश्नों के उत्तर कहाँ
राज नेतायों के प्रपंच कैसे बढे अपराधिओं के हिम्मत है कैसे
ये संस्कारों का ह्रास कैसे इन प्रश्नों के उत्तर कहाँ
ये सृजन शक्ति का अपमान कैसा ये सभ्यता का परिहास कैसा
दायित्व ये हमारा ही है चेतना जगाएं हम यहाँ
इन सवालों का जवाब देश के जो है नवाब
यदि उनमे जागृत हो सतर्कता तो डर नहीं है क्यों ज़नाब ?
हम आत्म मंथन तो करें देखे तो अपना योगदान
अपने को जागृत करके ही गढे हम नया हिन्दोस्ताँ
गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010
इस पार प्रिये तुम हो
मुझे उस पार…. नहीं जाना ………..क्योंकि इस पार …
मैं तुम्हारी संगिनी हूँ ……..उस पार निस्संग जीवन है
स्वागत के लिए ……………इस पार मैं सहधर्मिणी
कहलाती हूँ ……..मातृत्व सुख से परिपूर्ण हूँ………………..
माता – पिता है …..देवता स्वरुप …….पूजने के लिए
उस पार मै स्वाधीन हूँ ………पर स्वाधीनता का
रसास्वादन एकाकी है……….. गरल सामान……..
इस पार रिश्तों की पराधीनता मुझे ……………….
सहर्ष स्वीकार है…………इस पार प्रिये तुम हो
कहलाती हूँ ……..मातृत्व सुख से परिपूर्ण हूँ………………..
माता – पिता है …..देवता स्वरुप …….पूजने के लिए
उस पार मै स्वाधीन हूँ ………पर स्वाधीनता का
रसास्वादन एकाकी है……….. गरल सामान……..
इस पार रिश्तों की पराधीनता मुझे ……………….
सहर्ष स्वीकार है…………इस पार प्रिये तुम हो
शनिवार, 16 अक्टूबर 2010
विचारों का बादल...........
विचारों का बादल उमड़ते घुमड़ते आ ही जाते है
शब्द जाल के उधेड़ बुन में जकड़ ही जाते है
व्याकरण की चाशनी में डूब ही जाती है
वर्ण-छंद के लय ताल में पिरो दी जाती है
लेखनी की झुरमुटों से जब निकलता है
विचार मात्र विचार ही नहीं वांग्मय बन जाता है
कृति ये ज्योत बनकर जगमगाता है
अपने प्रकाश से प्रकाशित कर सब पर छा जाता है
तिस पर उसे गर स्वर में बांधा तो गीत बनता है
सुर का जादू गर चले तो समां बंध जाता है
विचारों को बढ़ने के दो पग मिल जाते है
(इस तरह )सम्पूर्णता को प्राप्त कर वो झिलमिलाते है
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