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रविवार, 23 जनवरी 2011

यारा लगा मन..........


यारा लगा मन फकीरी में 
न डर खोने का 
न खुशी कुछ पाने का 
ये जहां है अपना 
बीते न दिन गरीबी में 

यारा लगा मन फकीरी में 

जब से लागी लगन उस रब से 
मन बैरागी सा हो गया 
पथ-पथ घूमूं ढूंडू पिया को 
ये फकीरा काफ़िर बन गया 

मन फकीरा ये जान न पाए 
आखिर उसे जाना है कहाँ 
रब दे वास्ते ढूंडन लागी 
रास्ता-रास्ता गलियाँ-गलियाँ 

क्या करूँ कुछ समझ न आये 
उस रब दे मिलने के वास्ते 
ढूँढ लिया सब ठौर-ठिकाने 
गली,कूचे और रास्ते 

जाने कब जुड़ेगा नाता 
और ये फकीर तर जावेगा 
सूख गयी आँखे ये देखन वास्ते 
रब ये मिलन कब करवावेगा

3 टिप्‍पणियां:

  1. आध्यात्म की ओर अग्रसर करने वाली अच्छी रचना ..

    उत्तर देंहटाएं
  2. कविता हो या गीत ...आप अपनी छाप छोड़ने में कामयाब हैं ! हार्दिक शुभकामनायें !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. आध्यात्म की ओर अग्रसर करने वाली अच्छी रचना|धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं

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