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रविवार, 31 जुलाई 2011

आज भी रोये वन में -nazrul giti




আজো কাঁদে কাননে কোয়েলিয়া।
চম্পা কুঞ্জে আজি গুঞ্জে ভ্রমরা-কুহরিছে পাপিয়া।।
প্রেম-কুসুম শুকাইয়া গেল হায়!
প্রাণ-প্রদীপ মোর হের গো নিভিয়া যায়,
বিরহী এসে ফিরিয়া।।
তোমারি পথ চাহি হে প্রিয় নিশিদিন
মালার ফুল মোর ধুলায় হ’ল মলিন
জনম গেল ঝুরিয়া।।



হাস্বৗর-ত্রিতাল


आज  भी रोये वन में कोयलिया 
चंपा कुञ्ज में आज गुंजन करे भ्रमरा -कुहके पापिया 
प्रेम-कुञ्ज भी सूखा हाय!
प्राण -प्रदीप मेरे निहारो हाय!
कहीं बुझ न जाय विरही आओ लौट कर हाय!
तुम्हारा पथ निहारूं हे प्रिय निशिदिन 
माला का फूल हुआ धुल में मलिन 
जनम मेरा विफल हुआ 

राग-हमीर 
ताल-त्रिताल 

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