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बुधवार, 1 सितंबर 2010

मै और मेरी तन्हाई




इस सूने कमरे में है बस
मै और मेरी तन्हाई
दीवारों का रंग पड गया फीका
थक गयी आँखे पर वो न आयी
छवि जो उसकी दिल में समाया
दीवारों पर टांग दिया
तू नही पर तेरी छवि से ही
टूटे मन को बहला लिया
पर क्या करूँ इस अकेलेपन का
बूँद-बूँद मन को रिसता है
उस मन को भी न तज पाऊँ मै
जिस मन में वो छब बसता है
शायद वो आ जाए एक दिन
एकाकी घर संवर जाए
इस निस्संग एकाकीपन को
साथ कभी तेरा मिल जाए

2 टिप्‍पणियां:

  1. खूबसूरत अभिव्यक्ति ..


    कमेन्ट बॉक्स से वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें ...टिप्पणी करना मुश्किल होता है ..

    उत्तर देंहटाएं
  2. kam shabdon main
    sundar rachna

    श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं

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Comments

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